मे कोण हु ?… मे क्या हु ?(What am I?….. Who am I?)

संसार की समस्या जटिल और प्रचंड है, इसका समाधान बहार नहीं,इसके समाधान के लिये आप को सरल और प्रत्यक्ष होना होगा,समाधान समस्या निर्मित करने वाले मे ही है। सारे उपद्रव ,घृणा,नासमजी,अातंक,भयको पैदा करने वाला कोई और नहीं ,आप और मै ही है,व्यक्ति ही है,न की यह संसार , आप का औरोसे जो संबंध है वही संसार है,हमसे अलग कोई संसार नहीं है,अतः समस्या संसार नहीं आप और मै है, यह संसार तो हमारा ही प्रक्षेपण है,इसे समजनेके लिये हमे अपने आप को समझना होगा,की मे क्या हु ?

जैसा की मेने कहा, हमे अपने आप को समझने की प्रक्रिया की छानबिन करनी है ।यह प्रक्रिया संसार से पलायन की साधु,संन्यासी होने की कोई अलगाव की प्रक्रिया नहीं है,आप अलग नहीं हो सकते ,होने का मतलब ही संबंधीत होना है ,आप जाकर कहा जायेगे,सही संबंध का अभाव ही द्वंद्व पैदा करता है, कष्ट और कलह को जन्म देता है,हम हमारे संबंध मे बदलाव ला सकेतो वह परिवर्तण संसार को बदल देगा।

संसार मे परिवर्तण स्व के परिवर्तण से ही संभव है, स्व ही मानव अस्तित्व की समस्त प्रक्रिया का परिणाम एवं अंग है।बिना जाने की आप क्या है,सही विचार का कोई आधार नहीं होता, हम जैसे है वेसेही स्व को जाने,नकी जेसा बनना चाहते है जो केवल एक आदर्श मात्र होगा इसलिए भ्रामक एंव अयथार्थ होगा।

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जो है, परिवर्तण केवल उसी मे किया जा सकता है,उसमे नहीं जो आप होना चाहते है,आप जैसे है उसे जानने के लिये आप को असाधारण रूप से सजग रहना होगा,क्योकि जो है ,वह निरंतर बदल रहा है,और उसे उसी क्षण मे समजा जा सकता है, आप कीसी खास रूढि,विश्वास,धारणा,प्रक्रिया,खास कार्य पध्दति से जकडे नहीं होते,किसी कोभी समजना हो तो आप को बंधे रहना उपयोगी न होगा।आप जैसे भी हो,सूदंर,करूप,लोभी,कामि हो उसे स्वीकार कर उसी क्षण प्रत्यक्ष करना होगा,और यही सदाचार है,सदाचार आपको मुक्त कर देता है …….

इस प्रक्रिया को समझने के लिये जो है,उसको जानने की मंशा होनी आवश्यक है,हरेक विचार,भावनाऔर क्रिया को समजना आवश्यक है।लेकीन जो है, उसे समझना अत्यंत कठिन है,क्योंकि वह स्थिर,गतिहीन नहीं है,वह सदा गतिशील होता है।

वास्तविकता वही है जो आप हर क्षण कर रहे है,सोच रहे है,महसूस कर रहे है,अनूभव कर रहे है,और  इसे समजनेके लिये आप को कहीं अधिक जागरूकता,सजगताकी जरूरत होती है, जो है, उसे समझने के लिये मन की एक ऐसी अवस्था की जरूरत होती है, जिसमें न तादात्म्य हो और न ही तिरस्कार,जिसका अर्थ है एक ऐसा मन जो सतर्क है किंतु निष्क्रिय है।हममें से अधिकांश की कठिनाई यह है कि हम सीधे तौर पर स्वयं को नहीं जानते,और हम किसी ऐसी प्रणाली,ऐसी पध्दति,ऐसे तरीके को खोजते रहते है जिसके जरिये हमें तमाम मानवीय समस्याओं से निजात मिल जाये।अब क्या स्वयं को जानने का उपाय, कोई विधि है ?

कोई भी चतुर व्यक्ति या कोई भी दार्शनिक किसी विधि या पध्दति का आविष्कार कर सकता है,लेकिन यह भी तय है कि विधि के अनुसार का परिणाम भी उसी विचार प्रणाली के दायरे मे होगा।सर्जनशीलता तो केवल स्वतंत्रता मे ही संभव है,सर्जनशीलता केवल स्वबोध से ही आ सकती है,हम दोहराने वाली मशीनें है,सर्जनशील होने का अर्थ चित्रकारी करे,कविताएं लिखे और प्रसिध्द हो जायें,यह तो बस किसी विचार को अभिव्यक्त करना है,अभिव्यक्ति की क्षमता और सर्जनशीलता दो अलग बातें है।

सर्जनशीलता पूर्णतया एक दुसरी अवस्था है,यह ऐसी अवस्था है जिसमें स्व मौजूद नहीं रहता, जिसमें मन हमारे अनुभवों, हमारी महत्वाकांक्षाओ,हमारी दौड और हमारी इच्छाओं का केंद्र नहीं बना रहता।यह निरंतरता की अवस्था नही है,यह क्षण प्रतिक्षन नवीन होती है,यह एक ऐसी गति है,जिसमे मै ,मेरा,कुछ नहीं रहता,जिसमे विचार किसी विशेष अनुभव,महत्वाकांक्षा,उपलब्धि,प्रयोजनऔर अभिप्राय पर केंद्रित नहीं रहता।सर्जनशीलता केवल वही है,जहा स्व का अभाव है और यही वह अवस्था है जिसमें वह यथार्थ संभव होता है जो सभी वस्तुओं का सर्जक है।परंतु इस अवस्था की न तो कल्पना कि जा सकती है न अवधारणा बनायी  जा सकती है।

पोस्ट अनिल स्वामी

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