भगवान बुद्ध का अंतिम उपदेश

Last sermon of lord Budda:

बुद्ध एक गांव में ठहरे थे। और उस गांव के एक कुंदा नामक लोहार ने,एक गरीब आदमी ने बुद्ध को निमंत्रण दिया की मेरे घर भोजन करो। उस की बड़ी तमन्‍ना थी की जीवन में एक बार भगवान उसके यहाँ भी भोजन ग्रहण करे।

वह निमंत्रण दे ही रहा था कि इतनी देर में गांव को कोई धन पति ने आकर भगवान को कहा कि आज का भोजन निमंत्रण मेरा ग्रहण करे। पर भगवान बुद्ध पहले ही निमंत्रण ले चुके थे। उन्होंने धनवान व्यक्ति को मना कर इस गरीब के घर जाने का निर्णय लिया था। पर इस गरीब के पास भगवान बुद्ध को खिलने के लिए कुछ नहीं था।

भगवान बुद्ध गये। उस आदमी को भरोसा भी न था कि भगवान उसके घर पर भी कभी भोजन ग्रहण करेने के लिए आएँगे। उसके पास कुछ भी न था खिलाने को वस्‍तुत:। सब्‍जी के नाम पर बिहार में गरीब किसान वह जो बरसात के दिनों में कुकुरमुत्‍ते पैदा हो जाते है—

लकड़ियों पर, गंदी जगह में—उस कुकुरमुत्‍ते को इकट्ठा कर लेते है। सुखाकर रख लेते है। और उसी की सब्‍जी बनाकर खाते हैं। कभी-कभी ऐसा होता है कि कुकुरमुत्‍ते जहरीले हो जाता है। जो व्यक्ति ने सब्जी बनाई वो जहरीली थी। कुकुरमुत्‍तों में जहर था।

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बुद्ध के लिए उसने कुकुरमुत्‍ते की सब्‍जी बनाई। और भगवान बुद्ध यह सब्जी खा गए यह सोच कर की इसे बताया तो यह कठिनाई में पड़ेगा; उसके पास कोई दूसरी सब्‍जी नहीं है। वह उस ज़हरीली सब्‍जी को खा गये।

इसी भोजन के कारन भगवान बुद्ध की मृत्यु होती है। मृत्यु से पहले जब कुंदा को पता चलता है वो बोहोत विलाप करता है। की सारे संसार को प्रकाश देने वाले आज मेरे यहाँ का भजन खा के विलीन हो रहा है वो बोहोत विलाप करता है। तभी भगवान बुद्ध बड़ी करुणा से उसको समजते है की तू सौभाग्य साली है।  क्‍योंकि कभी हजारों वर्षों में बुद्ध जैसा व्‍यक्‍ति पैदा होता है। दो ही व्‍यक्‍तियों को उसका सौभाग्‍य मिलता हे। पहला भोजन कराने का अवसर उसकी मां को मिलता है और अंतिम भोजन कराने का अवसर तुझे मिला है। 

भगवान बुद्ध उस कुंदा को सात सूत्र बताये जो भगवान बुद्ध के अंतिम उपदेश है।

१ )श्रद्धा ……श्रद्धा को हिलने मेत दो

एक होती है अंधश्रद्धा दूसरी अश्रद्धा और तीसरी श्रद्धा। प्राणवायु शरीर को ताज़ा रखती है। और श्रद्ध आत्मा को। परमात्मा को समझने के लिए उनमे इतनी श्रद्धा रखनी भी जरुरी है।

२) पाप कर्म से लज्जित होता है। जिस कर्म में अहंकार शामिल होगा वो सभी कर्म पाप कर्म है। अगर आप दान भी अहंकार से दे रहे हो तो वो भी पाप कर्म है।

३) सुभ विद्या का संचय। …… विद्या अक्सर संत। .शास्त्र और प्रकृति से सीखनी चाहिए।

४) लोक अपवाद से डरना नहीं। जगत ऐसा ही है। उसकी चिंता मत करना।

५) सत कर्म करना। ….पूर्ण से जो कर्म किया जाता है वो सत कर्म ही है परमात्मा भाव से हुआ कर्म सत कर्म ही है।

६) होश पूर्ण रहना……जीवन में स्मृति होश पूर्ण रखना। स्मृति सोइ होतो मोह होता है। इस लिए अपनी स्मृति को जगाये रखना।

७) अपने बोध को बाटना। .अपनी समाज को लोक कल्याण में लगाना।

ये सात सूत्र भगवान बुद्ध के अंतिम उपदेश है। जो बोहोत गहन और कल्याणकारी है।

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