प्रकृति और पुरुष

सांख्य दर्शन में प्रकृति और पुरुष की बात की गई है। भगवतगीता में भगवान श्रीकृष्ण प्रकृति -पुरुष बात करते नजर आते है।

संत ज्ञानेश्वर ने मराठी अनुभव अमृत नामक ग्रंथ में प्रकृति, पुरुष का जिक्र अहम् -इदम नाम से किया है। संत कबीर और कई सरे संतो ने सुरता पुरुष नाम से संबोधित किया है।

आध्यात्म में प्रकृति पुरुष को जानना अनिवार्य है। इसे जाने बगैर दूसरी कोई भी बात समजना मुश्किल है।

तो चलो जानते है प्रकृति और पुरुष को।

प्रकृति

भगवतगीता के आधार पर प्रकृति को समजना आसान होगा। कृष्ण कहते है की प्रकृति २ प्रकारकी है।

१ ) अपरा प्रकृति

२ ) परा प्रकृति

१) अपरा प्रकृति :अपरा प्रकृति यानि पांच तत्व ( पृथ्वी , वायु, जल ,आकाश ,तेज ) और मन ,बुद्धि ,अहंकार इसे अष्टथा प्रकृति भी कहा जाता है।

यह प्रकृति जड़ है।

२) परा प्रकृति : परा प्रकृति वो है। जो अपरा को जानती है।

प्रकृति में जो जानना देखना अनुभव करने वाला तत्व परा प्रकृति है।

परा प्रकृति अपरा प्रकृति को जानती है। क्युकी परा प्रकृति चेतन है ,और अपरा प्रकृति जड़ है।

सारा अस्तित्व का खेल परा -अपरा प्रकृति का है।

यह सारा खेल जड़ – चेतन का ,देश -काल (टाइम -स्पेस ) में होता है। टाइम -स्पेस भी प्रकृति है।

इन्ही दो प्रकृति में सारा त्रिपुटी का व्यव्हार होता है।

द्रष्टा ,द्रश्य ,दर्शन – ज्ञेय ,ज्ञाता ,ज्ञान – अनुभव ,अनुभोगता ,विषय – नाम,रूप,गुण – ऑप्जेक्ट ,सब्जेक्ट ,कॉन्सेस -का सारा खेल प्रकृति का है।

द्रष्टा , ज्ञाता , अनुभोगता , सब्जेक्ट परा प्रकृति है।

द्रश्य , ज्ञेय , ऑप्जेक्ट अपरा प्रकृति है।

और ये दोनों प्रकृति एक दूसरे से एकदम एकरस जुडी है। जहा परा है वह अपरा प्रकृति होगी और जहा अपरा प्रकृति है वह परा प्रकृति होगी है।

अगर एक को निकल दी जाये तो दूसरी स्वयं गिर जाएगी।

द्रष्टा , ज्ञाता , अनुभोगता , सब्जेक्ट , द्रश्य , ज्ञेय , ऑप्जेक्ट सारा प्रकृति में ही होता है।

कोई भी जानना, कोई भी अनुभव , कोई भी दर्सन प्रकृति का ही होता है।

पुरुष

अब जानते है पुरुष को। यह कहना ठीक नहीं है मगर भाषा की अपनी मर्यादा है। सब्द सिमित है। पुरुष को जाना नहीं जा सकता। ……

हुआ जा सकता है। और आप वो हो ही।

पुरुष को साक्षी,आत्मा ,परमात्मा ,केवल पूर्ण ,बोध,समज आदि सब्दो से सम्बोधित करते है।पुरुष -प्रकृति में आयाम गत (डायमेंशन ) अंतर है। पुरुष के आयाम में कोई

दष्टा , द्रश्य ,दर्शन – ज्ञेय ,ज्ञाता ,ज्ञान – अनुभव ,अनुभोगता ,विषय – नाम,रूप,गुण – ऑप्जेक्ट ,सब्जेक्ट ,कॉन्सेस आदि नहीं होते ।

केवल पुरुष ही होता है। और वो किसी का विषय भी नहीं बनता ,

और नहीं वो कुछ जानने वाला है वह बस बोध मात्र ,समज मात्र है।

वास्तविक कर्ता -कर्म , ज्ञेय -ज्ञाता ,ऑप्जेक्ट -सब्जेक्ट , प्रकृति ही है।

जब ज्ञाता परा है। तो सारा पिंड ब्रम्हांड ज्ञेय होता है।

तो वास्तव में कर्म ,द्रष्टा , ज्ञाता प्रकृति ही है। मगर हम समजते है।

की “में” ने किया , “मेने “देखा , “मेने “जाना, “मेने” अनुभव किया।

इस वजह से झुठ “में” खड़ा हो जाता है। जो वास्तव में है ही नहीं मात्र भ्रम है।

कार्य -करण ,करता -कर्म प्रकृति है। और भोक्ता भी प्रकृति है। मगर झुठ “में” के वजह से हम अपने आप को कर्ता और भोक्ता समजते है।

इस “में ” को मिटाना नहीं ने क्युकी वो है ही नहीं मात्र भ्रम है। इस भ्रम के खड़े होने से बचना है। https://popularglobalblog.com/depression/

प्रकृति पुरुष को अच्छी तरह समजने से हर पल हर क्षण जो झठा “में” खड़ा हो रहा है उसे बचा जा सकता है।

आप ऐसे आर्टिकल अगले लेख में जान पाओगे। …..इस से जूडी कोई भी जानकारी के लिए हमारा वेबसाइट फॉलो करे। …….

धन्यवाद।

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4 thoughts on “प्रकृति और पुरुष

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