चेतन मन, अचेतन मन और चेतना (Conscious mind, unconscious mind and consciousness)

A Complete Guide to Meditation | Everyday Health

चेतन मन, अचेतन मन और चेतना (Conscious mind, unconscious mind and consciousness)


हम सभी चेतन, अचेतन मन के बारे मे जानते है,अधिकांश व्यक्ति मन के उपरी स्तर पर ही कार्य करता है हमारा सारा जीवन उसी तक सीमित है,और कभी कभार अचेतन मन से कोई आवाज उठती है तो हम उसे भी चेतन मन के मांगो के अनुसार उपेक्षित , विकृत या रूपांतरित कर दिया करतो है।यह हम सभी जानते है।हमारा चेतन मन से क्या तात्पर्य है, यह जानना होगा,

 क्या चेतन मन ,अचेतन मन से भिन्न है ? 

हमने चेतन को अचेतन से पृथक कर लिया है,क्या से सही है?

 क्या चेतन,अचेतन मे विभाजन है ? 

क्या कही कोई निश्चित सिमा रेखा है,जहासे चेतन और अचेतन अलग अलग हो,हम जानते है उपरी चेतन मन सक्रिय है,और हमारा अवचेतन मन तथ्यो के आधार पर सामंजस्य बिठा लेता है, अचेतन मन विद्रोह करता है और चेतन,अचेतन मन मे द्वंद्व होता है,यह हमारी समस्या है, वास्तव में चेतन, अचेतन अवस्था एक ही है,चेतन,अचेतन जेसी कोई दो अलग अलग अवस्था नही है, यह दोनो चेतना की ही अवस्था है और चेतन , अचेतन हमेशा अतीत के होते है,वर्तमान की कभी नही होती,हम केवल वही बातोसे सचेत होते है जो हो चूका है,चेतन,अचेतनमे चेतना अतित एंव भविष्य के बीच कार्य करती है और वर्तमान केवल अतीत से भविष्य की और की रहा भर है, अतः चेतना अतित की भविष्य की और गति है।

आप मन के कार्य को देख पाएआप पाएंगे कि अतित की और तथा भविष्य की और होने वाली गति एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें वर्तमान है ही नहीं। चेतन और अचेतन हमारी चेतना की ही अवस्था है,चेतना हमेशा अतीत को भविष्य के रूप मे प्रक्षेपीत करती है,हमारी चेतना तथ्य को प्रत्यक्ष रूप से तथा निष्पक्षता से देखने मे असमर्थ है,या आप तथ्य की निंदा या परीत्याग कर सकते है या उसका स्वीकार कर उससे तादात्म्य कर लेता है,ऐसी चेतना तथ्य को तथ्य के रुप में देखने मे असमर्थ है,यही है हमारी चेतना की अवस्थाजो अतीत से संस्कारीत है ,जितना अधिक आप अतीत के संस्कारबध्दता अनुसार प्रतिक्रिया करेंगे,उतना ही अतीत दृढ़ होता जायेगा,अतीत का दृढ़ होना ही निरंतरता है और उसे वह भविष्य कहता है, आपके चेतना की यही अवस्था है वह अतीत और भविष्य मे झूलता रहता है वहा कोई वर्तमान नही है, साफ है ,ऐसी चेतना एक भिन्न स्तर पर काम नहीं कर पाती,क्योकि वह अतीत और भविष्य उस गति से ही परिचित है।

आप देख पाऐ तो आप को समझमे  आयेगा की चेतना एक सतत प्रवाहमान गति नहीं है,दो विचार के बीच एक अतिशय सूक्ष्म अंतराल है ,और वह अंतराल वर्तमान है, हमारी सोच अतित की है और अतीत को भविष्य मे प्रक्षेपीत करती है,जीस समय आप अतीत को स्वीकार करते है तब आपको भविष्य भी स्वीकार करना पडता है,अतीत और भविष्य दो अवस्था नही है एक ही अवस्था है, जिसमें चेतन,अचेतन ,सामुहीक , व्यक्तिगत सभी का समावेश है,अब जीस समय आपके पासअतीत होता है उसी समय अनिवार्यतः एक भविष्य भी होता है। 

यदि आप निरीक्षण करें तो आप देखेंगे कि उसके बिच अवकाश होता है विचार के बीच अंतराल होता है दो विचार के बीच मौन की एक अवधि होती है,जो विचार प्रक्रिया से संबंधित नही होति , निरीक्षण करने पर आप देखेंगे कि मौन की यह अवधि ,यह अंतराल, समय से संबंधित नही है और इस अंतराल का अन्वेषन,इस अंतराल की पूर्ण अनुभूति आपको संस्कारबध्दता से मुक्त कर देती है, हम यह समजनेका यत्न कर रहे है कि क्या मन स्वयं को उस पृष्टभूमी से मुक्त कर  सकता है।जब मन विचार को निरंतरता प्रदान नही करता ,तब ऐसी  स्थिरता मे स्थिर है जो न प्ररित है और न जिसका कोई कारण है, केवल तभी उस पृष्टभूमी से मुक्ति संभव है ……….

पोस्ट अनिल स्वामी

यह लेख बेटीयों के प्रेम और उपहार का धन्यवाद है………..

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