क्या ईश्वर है ?

क्या ईश्वर है?क्या ईश्वर है या नहीं? क्या ईश्वर है?kya ishwar hai ?क्या ईश्वर का अस्तित्व है?

इसका जवाब “हां” या “ना” में नहीं दिया जा सकता। आइए मिलकर खोजते हैं। समझते हैं।

एक आदमी ने बुद्ध से पूछा ईश्वर है? बुद्ध ने कहा “नहीं” , इसी दिन दूसरे आदमी ने पूछा ईश्वर है? बुद्ध ने कहा “निश्चित ही ईश्वर है'” सांझ तीसरे आदमी ने पूछा ईश्वर है ? बुद्ध ने कुछ ना बोलते चुप रहे गए ” मौन” .

रात्रि में उनका शिष्य आनंद उनसे कहने लगा “आप मुझे पागल कर देंगे क्या” क्योंकि तीनों वक्त आनंद वहां हाजिर था बुद्ध ने कहा “उनमें से कोई भी उत्तर तुम्हारे लिए नहीं था वह तीनों अपनी- अपनी धारणाओं से बंधे हैं उनकी धारणा के कारण उनकी खोज रुकी थी    वह मौन बैठे थे उनको खोज की और धकेलना था”

” जो मेरे पास पहले से ही भाव लिए आया था ‘ईश्वर नहीं है’ उनको मैंने कहा ईश्वर है। उनको उनकी स्थिति से हटाना जरूरी था। . वह नास्तिक था उसकी नास्तिकता झूठी थी उनकी नास्तिकता डामाडोल करना जरूरी था। यात्रा बंद हो गई थी बिना कुछ जाने मानकर बैठ गया था कि ईश्वर नहीं है। धारना लिए घूम रहा था उसको धक्का देना जरूरी था उसको राह पर लगाना जरूरी था तो मैंने कहा ईश्वर है। “

और दूसरा आदमी आया था। वह बिना खोजे ,बिना जाने बिना साधना किए मानकर बैठ गया था कि ‘ईश्वर है’ वह झूठा आस्तिक बने बैठा था उसको भी धक्का देना जरूरी था तो मैंने कहा “ईश्वर नहीं है” और जो तीसरा शाम के समय आया था , उसको अपनी कोई धारणा नहीं थी कोई विश्वास नहीं था , वह परम खोजी था उसको कोई भी उत्तर देना ठीक नहीं था तो मैं चुप रहा “मौन” उत्तर मोन ही था और वह समझ गया।

एक बात और मास्टर एक्हार्ट । …….ने कहा है ” TRUTH IS SOMETHING SO NOBLE THAT IF GOD COULD TURN ASIDE FROM IT COULD KEEP THE TRUTH AND LET GOD GO ” मास्टर एक्हार्ट कह रहे है की ‘गॉड को छोड़ दिया तो कोई नुकसान नहीं सत्य को छोड़ दिया तो सब नुकसान हो गया ‘

जो ईश्वर है वह हमारी अपनी अपनी ही मन की कल्पना है। वह झूठ हो जाए तो कोई तकलीफ नहीं ईश्वर हमारी ही क्रिएशन है। हमारी ही धारणा है।वो छूट जाए बड़ी बात नहीं। वास्तविक परम है वह सत्य से जुदा नहीं है। वह जुदा है उसका छुटना जरूरी है , बहुत ही क्रांतिकारी वक्तव्य है।

मास्टर एक्हार्ट का सत्य इतना अमूल्य है। कि उसके लिए ईश्वर को भी छोड़ दूंगा। उस वक्त यह बात करने वाला यह अकेला आदमी था कोई फैशन के तौर पर कहा नहीं  था। निस्ते ने 400 साल पहले घोषणा की की “ईश्वर मर गया है ” यहां एक बड़ा वक्तव्य है।

ईश्वर हमारे भय और कामना की क्रिएशन है। हम कमजोर, शक्तिहीन, सीमित, दुखी ,और हारे हुए और हमारे ईश्वर सर्व संपन्न, शक्तिशाली, असीम, अनंत, सब कुछ जानने वाला जो हमारी ही विपरीत ध्रुव है। जो हमारे भय और कामना के कारण मन की कल्पना ने बनाए हैं।

आपने ईश्वर की भी कल्पना अपने ही रंग रूप में की। मनुष्य ने ईश्वर का चित्र भी मनुष्य के रूप में ही चित्रित किया उसको श्रेष्ठ बनाने के लिए चार हाथ लगा दिए , तीन आंखें बना दी ,ज्यादा सिर बना दिए , यह ईश्वर आपका अपना ही बनाया हुआ है। यह ईश्वर आपकी मान्यता ,धारणा ,संस्कार ,आपकी स्मृति का ही प्रक्षेपण है।

आपको उसे जानना होगा तभी आप सत्य को जान पाओगे और सत्य आपको ध्यान पूर्ण , बोध पूर्ण, होश पूर्ण समझ में ही मिलेगा और उसके लिए आपको बोध पूर्ण होना ही होगा। आपके बेहोशी के ईश्वर को विदा होना ही होगा। तब सत्य समझ में आएगा।

जे कृष्णमूर्ति कहते हैं कि “दूसरे के पूरे ज्ञान को , ध्यान के बारे में ,जो सोचा गया उसको नकार देना ,सत्य के बारे में जो सोचा गया उसको नकार देना ,मौन के बारे में जो सोचा गया उसे नकार देना ,और अनंत के बारे में जो सोचा गया उसे नकार देना ,समय से परे होने के बारे में जो सोचा गया उसे नकार देना , ईश्वर के बारे में जो सोचा गया उसे नकार देना ,दूसरे का अनुभव जो आपकी धारणा है। उसको छोड़ देना अपनी धार्मिक किताबों को छोड़ देना। अपने धार्मिक संस्कारों को छोड़ देना अपने विश्वास को छोड़ देना , क्योंकि तुम अब जानते हो कि वो आपके विचारों का ही नतीजा है ,जब आप तमाम धारणा से मुक्त होगे तब आप मानसिक तौर पर किसी पर भी निर्भर नहीं होगे , आप डर से भी आजाद हो जाएंगे आप सारे दुखों से भी आजाद हो जाएंगे , क्योंकि तब आपके पास अपना कोई “मैं “नहीं होगा।

मैं भी आपको’ क्या ईश्वर है? ‘उसका उत्तर देना नहीं चाहूंगा आप खोजें जाने सत्य क्या है?

“जब खुदा से मैंने उसका पता मांगा तो उसने मुझे मेरा ही पता बता दिया और कहां खुदा खुद में ना मिलेगा तो और कहां मिलेगा “

“जब खुदा से मैंने उसका खजाना मांगा तो उस ने खुद लूट जाने को कहा मैं लुटाता गया और वह मुझे भरता गया”

“जब खुदा से मैंने उसको रोशनी मांगी तो उसने खुद जल जाने को कहा मैं जलता गया और वह मुझे रोशन करता गया”

” जब खुदा ने मैंने मिलने को कहा तो उसने खुद को भूल जाने को कहा मैं भूलता गया और वह मिलता गया”


श्री अनिल स्वामी

इस आर्टिकल के लेखक है।
श्री अनिल स्वामी

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